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शीश-महल में एक एक चेहरा!
किसको पत्थर मारूँ ‘क़ैसर’ कौन पराया है,शीश-महल में एक एक चेहरा अपना लगता है| क़ैसर उल जाफ़री
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इस सूने घर में मेला लगता है!
दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं,शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है| क़ैसर उल जाफ़री
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सबका दामन भीगा लगता है!
इस बस्ती में कौन हमारे आंसू पोंछेगा,जो मिलता है उसका दामन भीगा लगता है| क़ैसर उल जाफ़री
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दिल का पागलपान!
आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन,आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है| क़ैसर उल जाफ़री
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प्यास!
कितने दिनों के प्यासे होंगे यारों सोचो तो,शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है| क़ैसर उल जाफ़री
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ये असंगति जिन्दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई!
स्वर्गीय भारत भूषण जी हिन्दी काव्य मंचों के ऐसे दिव्य हस्ताक्षर थे कि जिनकी उपस्थिति काव्य मंच को गरिमा प्रदान करती थी| उनके अनेक गीत मैंने पहले शेयर की हैं ‘मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना क्या मुरझाना’, ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी बाबा कबीर…
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चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी!
चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरीनींद सूरज सितारों को आने लगीइतने नाज़ुक क़दम चूम पाये अगरसोते सोते बियाबान गाने लगेमत महावर रचाओमत महावर रचाओ बहुत पाँव मेंफर्श का मरमरी दिल बहल जाएगा| नई उमर की नई फसल
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सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरी!
सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरीजैसे शबनम अंगारो की मेहमान होजादू बुनती हुई ये नशीली नज़रदेख ले तो खुदाई परेशान होमुस्कुराओ न ऐसेमुस्कुराओ न ऐसे चुराकर नज़रआइना देख सूरत मचल जाएगा| नई उम्र की नई फसल
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ये शरमसार मौसम बदल जाएगा!
साँस की तो बहुत तेज़ रफ़्तार हैऔर छोटी बहुत है मिलन की घडीगूंथते गूंथते ये घटा साँवरीबुझ न जाए कही रूप की फुलझड़ीचूड़ियाँ ही न तुमचूड़ियाँ ही न तुम खनखनाती रहोये शरमसार मौसम बदल जाएगा| नई उमर की नई फसल