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तुम भी घर देर से आओगे!
जब सूरज भी खो जायेगा और चाँद कहीं सो जायेगा,तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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आईने से घबराओगे!
तनहाई के झूले झूलोगे, हर बात पुरानी भूलोगेआईने से घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा सईद राही
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तावीज़ें भी बँधवाओगे!
हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे,तावीज़ें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा!
मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा,दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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चारागर भी पुराना चाहिए था!
अपनी ग़ज़लों में एक खास तरह का ‘पंच’ लेकर आने वाले स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अक्सर अपने श्रोताओं को चौंका देते थे, ऐसी कोई बात अपनी शायरी में लेकर आते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की यह ग़ज़ल- वफ़ा को आज़माना…
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हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे!
हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना| अहमद फ़राज़
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हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है!
हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जाना| अहमद फ़राज़
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मुद्दतों से ये आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद!
मुद्दतों से ये आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना| अहमद फ़राज़
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तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना!
अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना| अहमद फ़राज़
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तेरा एहसां जाना!
ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना| अहमद फ़राज़