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जड़ता के बावज़ूद।
आज फिर से मेरी एक पुरानी कविता प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- जड़ता के बावज़ूद। चौराहे पर झगड़ रहे थेकुछ बदनाम चेहरे,आंखों में पुते वैमनस्य के बावज़ूदभयानक नहीं थे वे।भीड़ जुड़ीऔर करने लगी प्रतीक्षा-किसी मनोरंजक घटना की।कुछ नहीं हुआ,मुंह लटकाए भीड़धाराओं में बंटी और लुप्त हो गई।**अगले चौराहे पर,अब भी जुटी है भीड़जारी…
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ज़ुल्म और सब्र का!
ज़ुल्म और सब्र का ये खेल मुकम्मल हो जाए, उस को ख़ंजर जो दिया है मुझे सर भी देना| मेराज फ़ैज़ाबादी
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अगली नस्लें तो न भटकें!
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन,अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना| मेराज फ़ैज़ाबादी
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अब मैं बोलूँगा तो!
गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था,अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना| मेराज फ़ैज़ाबादी
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बादलों से सलाम लेता हूँ!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में नीरज जी के कुछ अत्यंत लोकप्रिय मुक्तक शेयर कर रहा हूँ- बादलों से सलाम लेता हूँ! आशा है आपको ये पसंद आएंगे, धन्यवाद। *****
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ज़िंदगी दी है तो!
ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना,पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना| मेराज फ़ैज़ाबादी
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गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है!
गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखीऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए। गोपाल दास नीरज
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जब किसी से कोई गिला रखना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में, निदा फाज़ली साहब की प्रसिद्ध ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया था- जब किसी से कोई गिला रखना, सामने अपने आईना रखना! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। ******
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जिस्म दो होके भी!
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसेमेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए। गोपाल दास नीरज
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मैं रहूँ भूखा तो!
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसामैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए। गोपाल दास नीरज