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दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा!
स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैं उनसे कभी मिला नहीं, फ़ेसबुक पर मेरे मित्र थे, अपनी रचनाओं के बारे में सूचना देते रहते थे, जिनको पढ़कर मैं काफी प्रभावित होता था, विशेष रूप से फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी पर उन्होंने अत्यंत सराहनीय कार्य किया है| विभिन्न विषयों पर,…
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शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा!
बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा। इब्ने इंशा
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कहता नहीं ख़ामोश है!
बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा। इब्ने इंशा
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बस्ती तेरी, सहरा तेरा!
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा। इब्ने इंशा
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हर शख़्स दीवाना तेरा!
इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा। इब्ने इंशा
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मंज़ूर था परदा तेरा!
हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा। इब्ने इंशा
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शब भर रहा चर्चा तेरा!
कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा। इब्ने इंशा
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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी
एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया…
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मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं!
इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है, इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं। जावेद अख़्तर