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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Jan 2022

    क्या रह गया ?

    आप को देख कर देखता रह गया,क्या कहूं और कहने को क्या रह गया| वसीम बरेलवी

  • 19th Jan 2022

    दृश्य ही अदृश्य हो जाएगा!

    स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैं उनसे कभी मिला नहीं, फ़ेसबुक पर मेरे मित्र थे, अपनी रचनाओं के बारे में सूचना देते रहते थे, जिनको पढ़कर मैं काफी प्रभावित होता था, विशेष रूप से फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी पर उन्होंने अत्यंत सराहनीय कार्य किया है| विभिन्न विषयों पर,…

  • 18th Jan 2022

    शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा!

    बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, ‘इन्शा’ तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    कहता नहीं ख़ामोश है!

    बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    बस्ती तेरी, सहरा तेरा!

    कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    हर शख़्स दीवाना तेरा!

    इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    मंज़ूर था परदा तेरा!

    हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    शब भर रहा चर्चा तेरा!

    कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा। इब्ने इंशा

  • 18th Jan 2022

    गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी

    एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया…

  • 17th Jan 2022

    मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं!

    इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है, इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं। जावेद अख़्तर

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