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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Aug 2022

    जो घटाएँ गुज़र गईं!

    क्या जाने किसकी प्यास बुझाने किधर गईं, इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं| कैफ़ी आज़मी

  • 11th Aug 2022

    एक बार जो ढल जाएंगे!

    आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार, अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित माननीय श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी बताया है भोपाल में साहित्य और संस्कृति को समर्पित ‘भारत भवन’ की संकल्पना उनकी ही थी|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी…

  • 10th Aug 2022

    ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है!

    ‘क़तील’ उस दम भी रहता है यही एहसास-ए-महरूमी, जब उन शानों पे ज़ुल्फ़ों की घटा छाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    कुछ तो शर्माई भी होती है!

    चमकती है कोई बिजली तो शम-ए-रहगुज़र बनकर, निगाह-ए-बरहम इनकी कुछ तो शर्माई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की-

    ब-नाम-ए-कुफ्र-ओ-ईमाँ बे-मुरव्वत हैं जहाँ दोनों, वहाँ शैख़-ओ-बरहमन की शनासाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    जो पहले से मुरझाई भी होती है!

    बिखरती है वही अक्सर ख़िज़ाँ-परवर बहारों में, चमन में जो कली पहले से मुरझाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    दीवार-ए-तन्हाई भी होती है!

    हम उनकी बज़्म तक जा ही पहुँचते हैं किसी सूरत, अगरचे राह में दीवार-ए-तन्हाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    दीवानों की रुस्वाई भी होती है!

    गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता-आराई भी होती है, बहार आए तो दीवानों की रुस्वाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    गुलफ़ाम से जल जाते हैं!

    बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम, शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई

  • 10th Aug 2022

    गुमनाम से जल जाते हैं!

    शम्अ’ जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए, हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई

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