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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Feb 2022

    जो दिल में ठान लेते हैं!

    ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता, उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Feb 2022

    यादों की चादर तान लेते हैं!

    तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में, हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Feb 2022

    जान और ईमान लेते हैं!

    मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमां हैं, निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Feb 2022

    दूर से पहचान लेते हैं!

    बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 6th Feb 2022

    कविता कैसे लिखते हो तुम!

    राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो| एक फैशन सा बन गया है कि जिन कवियों की वाणी से आपातकाल के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकल पाया, आज वे जी भरकर सरकार को गालियां…

  • 5th Feb 2022

    तू इन्तज़ार कर शायद!

    जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं “फ़राज़”,फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद| अहमद फ़राज़

  • 5th Feb 2022

    याद-ए -याराने-बेख़बर शायद!

    जिंदगी भर लहू रुलाएगी,याद-ए -याराने-बेख़बर शायद| अहमद फ़राज़

  • 5th Feb 2022

    तेरी नज़र शायद!

    अजनबीयत की धुंध छंट जाए,चमक उठे तेरी नज़र शायद| अहमद फ़राज़

  • 5th Feb 2022

    और हमसफ़र शायद!

    जिनके हम मुन्तज़िर रहे उनको,मिल गये और हमसफ़र शायद| अहमद फ़राज़

  • 5th Feb 2022

    ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद!

    जान पहचान से ही क्या होगा,फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद| अहमद फ़राज़

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