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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Aug 2022

    जो जान और ईमान लेते हैं!

    मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैं, निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 28th Aug 2022

    हम दूर से पहचान लेते हैं!

    बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 28th Aug 2022

    वर्षान्त!

    आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और जैसा मैंने पहले भी लिखा है भोपाल में निर्मित भारत भवन साहित्य एवं संस्कृति कर्मियों के लिए उनकी अमूल्य भेंट है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…

  • 27th Aug 2022

    ज़ेहन की आवारगी से हम!

    शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था, ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    मिलने लगे हर किसी से हम!

    अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी, मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    मिल आए किसी से हम!

    कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे, मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    आइने को लगे अजनबी से हम!

    जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम, ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    पास से देखोगे अकेला होगा!

    एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक, जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    कभी तोड़ के देखा होगा!

    मिरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी, उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा| निदा फ़ाज़ली

  • 27th Aug 2022

    छोड़ आए वो दरिया होगा!

    प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली, जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा| निदा फ़ाज़ली

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