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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 26th Aug 2022

    जज़्बों की दहकाए हुए रहना!

    बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना, इक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना| मुनीर नियाज़ी

  • 26th Aug 2022

    वेला हुई संवत्सरा!

    एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक अत्यंत लोकप्रिय और सृजनशील रचनाकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| प्रेम के कवि सोम जी ने राष्ट्र, राष्ट्रभाषा और मानवता की भावभूमि पर अनेक प्रसिद्ध रचनाएं लिखी हैं| श्री सोम ठाकुर जी ने अनेक बार मेरे संस्थान के लिए आयोजित कवि…

  • 25th Aug 2022

    वो जब चाहेगा बुला लेगा!

    हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उससे रिश्ता ‘वसीम’, मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    लकीरें हाथ की वो सब जला लेगा!

    मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे, लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा!

    मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा, कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    मिरा इम्तिहान क्या लेगा!

    मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा, अब इसके बा’द मिरा इम्तिहान क्या लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    तूफ़ान हिला भी नहीं सकता!

    वैसे तो इक आँसू ही बहाकर मुझे ले जाए, ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता!

    घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी, मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    बता भी नहीं सकता!

    प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात, किसके लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    साथ निभा भी नहीं सकता!

    तू छोड़ रहा है तो ख़ता इसमें तिरी क्या, हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

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