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रौशनी ख़त्म न कर-
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे, रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा| निदा फ़ाज़ली
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मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा!
उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा, वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा| निदा फ़ाज़ली
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जितने-जितने सभ्य!
आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय और सृजनशील नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहूँ| कविताओं का शौक पैदा होने के बाद जिन कवियों को मैंने गोष्ठियों में और काव्य मंचों से बड़े चाव से सुना और उनके सानिध्य का मौका भी मिला उनमें स्वर्गीय रमेश रंजक भी शामिल…
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हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया!
एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं ‘मुनीर’ ,जिसने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम ओ बादा कर लिया| मुनीर नियाज़ी
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ख़ुद को उससे आधा कर लिया!
ग़ैर से नफ़रत जो पाली ख़र्च ख़ुद पर हो गई, जितने हम थे हमने ख़ुद को उससे आधा कर लिया| मुनीर नियाज़ी
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मैंने भी वा’दा कर लिया!
जानते थे दोनों हम उसको निभा सकते नहीं, उसने वा’दा कर लिया मैंने भी वा’दा कर लिया| मुनीर नियाज़ी
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हद से ज़ियादा कर लिया!
बे-ख़याली में यूँही बस इक इरादा कर लिया, अपने दिल के शौक़ को हद से ज़ियादा कर लिया| मुनीर नियाज़ी
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उकताए हुए रहना!
आदत ही बना ली है तुमने तो ‘मुनीर’ अपनी, जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना| मुनीर नियाज़ी
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आँखों में चमकाए हुए रहना!
इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से, इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना| मुनीर नियाज़ी
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शरमाए हुए रहना!
उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आए, पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना| मुनीर नियाज़ी