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वो आपका गुलनार हो जाना!
ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना, मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आपका गुलनार हो जाना| मुनव्वर राना
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माशो की माँ!
हिन्दी में हास्य व्यंग्य के एक प्रमुख कवि हैं श्री अशोक चक्रधर जी, लेकिन आज मैं उनकी जो कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ वह हास्य-व्यंग्य की नहीं अपितु अत्यंत भावपूर्ण कविता है, जो टमाटर बेचने वाली एक वृदधा के बारे में लिखी गई है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह भावपूर्ण…
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मगर आदमी अच्छा भी नहीं!
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि ‘फ़िराक़’, है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं!
यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़, मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं!
ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर, ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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सुना भी नहीं देखा भी नहीं!
अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं, तूने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं!
एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं!
मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त, आह अब मुझसे तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मोहब्बत का भरोसा भी नहीं!
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं, लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी