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पढ़ते हैं सब ताज़ा ग़ज़ल मेरी!
दम साध के पढ़ते हैं सब ताज़ा ग़ज़ल मेरी,किस लहजे में अबके मैं क्या बात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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महक जाते हैं चाँद-सितारे भी!
उस रात महक जाते हैं चाँद-सितारे भी,मैं नींद में ख़्वाबों को जिस रात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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सदमात बरतता हूँ !
कुछ और बरतना तो आता नहीं शे’रों में,सदमात बरतता था, सदमात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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जो ज़ख्म मेरे दिल को!
मिलते रहे दुनिया से जो ज़ख्म मेरे दिल को,उनको भी समझकर मैं सौग़ात, बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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यादों के लम्हात बरतता हूँ !
कंजूस कोई जैसे गिनता रहे सिक्कों को,ऐसे ही मैं यादों के लम्हात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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अपने हालात बरतता हूँ!
खुलते भी भला कैसे आँसू मेरे औरों पर,हँस-हँस के जो मैं अपने हालात बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!
इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ । राजेश रेड्डी
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क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है !
मेरे अत्यंत प्रिय रहे सृजनधर्मी नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रमेश रंजक जी ने वास्तव में नवगीत विधा में नई ऊँचाइयाँ हासिल की थीं और उनसे हमेशा चमत्कारिक अभिव्यक्ति की उम्मीद बनी रहती थी| काव्यधर्म का वे हमेशा कड़ाई से पालन करते थे और उन्होंने अनेक…