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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Apr 2022

    क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं!

    ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद,फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं!

    सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी,और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    फिर भी उधर जाता हूँ मैं!

    जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है,जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    और मर जाता हूँ मैं!

    शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं,मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    सूरज का निकलना जारी है!

    तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    उस बात का टलना जारी है!

    बरसों से जिस बात का होना, बिल्कुल तय सा लगता था,एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    पागल दिल का मचलना जारी है!

    जाने कितनी बार ये टूटा, जाने कितनी बार लुटा,फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    अपने आपको छलना जारी है!

    तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए,सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    ये ज़िस्म बदलना जारी है!

    रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है,जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    जीवन में अरमानों का !

    आज एक बार मैं अपने जमाने में काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग कविता से पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अक्सर कविता को आत्म कथन के रूप में, कहें कि अपनी गवाही, अपने स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रस्तुत करते…

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