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क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं!
ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद,फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं!
सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी,और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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फिर भी उधर जाता हूँ मैं!
जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है,जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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और मर जाता हूँ मैं!
शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं,मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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सूरज का निकलना जारी है!
तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है| राजेश रेड्डी
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उस बात का टलना जारी है!
बरसों से जिस बात का होना, बिल्कुल तय सा लगता था,एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है| राजेश रेड्डी
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पागल दिल का मचलना जारी है!
जाने कितनी बार ये टूटा, जाने कितनी बार लुटा,फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है| राजेश रेड्डी
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अपने आपको छलना जारी है!
तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए,सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है| राजेश रेड्डी
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ये ज़िस्म बदलना जारी है!
रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है,जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है| राजेश रेड्डी
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जीवन में अरमानों का !
आज एक बार मैं अपने जमाने में काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग कविता से पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अक्सर कविता को आत्म कथन के रूप में, कहें कि अपनी गवाही, अपने स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रस्तुत करते…