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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Oct 2022

    बिछड़ जाने का धड़का है बहुत!

    इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत, इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    वक़्त की मीनार पर!

    आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रतिष्ठापक और एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| हिन्दी नवगीत के पुरोधा के रूप में इनका बहुत सम्मान है|लीजिए, प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह गीत- मैं तुम्हारे साथ हूँहर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ। तुम जहाँ भी…

  • 12th Oct 2022

    हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!

    अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही, हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    ये दर्द जागता क्यूँ है!

    कहानियों की गुज़रगाह पर भी नींद नहीं, ये रात कैसी है ये दर्द जागता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है!

    जो दूर दूर नहीं कोई दिल की राहों पर, तो इस मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है!

    सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से, मिरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है!

    दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है, थका थका मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं!

    जिनसे हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं, शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    वहशत की सौग़ात कहाँ!

    जिसको देखो फ़िक्र-ए-रफ़ू है जिसको देखो वो नासेह, बस्ती वालों में हार आए वहशत की सौग़ात कहाँ| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    जंगल काफ़ी है वहशत के लिए!

    बे-हिस दीवारों का जंगल काफ़ी है वहशत के लिए, अब क्यूँ हम सहरा को जाएँ अब वैसे हालात कहाँ| राही मासूम रज़ा

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