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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Oct 2022

    इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें!

    ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें, इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं!

    देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ, मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    ख़्वाब पलकों पे सजाने के लिए हैं!

    आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे, ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं!

    सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की, वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं!

    अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें, कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं!

    अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं, कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    रात गए कोई किरन मेरे बराबर!

    जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर, चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    नद्दी कोई बल खाए तो लगता है!

    ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर, नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का!

    संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का, झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Oct 2022

    लचक जाए तो लगता है कि तुम हो!

    जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में, शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर

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