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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 30th May 2022

    मिट्टी के पीछे रतन खो गया!

    तन बचाने चले थे कि मन खो गया,एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया| रामावतार त्यागी

  • 30th May 2022

    माँ

    आज श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान दिया है|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने ‘माँ’ को एक अनूठे अंदाज़ में याद किया है – चेहरे परकुछ सख्त अँगुलियों के दर्द-भरे निशान…

  • 29th May 2022

    पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया!

    मंज़िल, इस महक की कहाँ किस चमन में है,इसका पता सफ़र में हवा ने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया!

    कुछ और वक़्त चाहते थे कि सोचें तेरे लिये,तूने वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    शहर-ए-यार में आने नहीं दिया!

    उस सिम्त मुझको यार ने जाने नहीं दिया,एक और शहर-ए-यार में आने नहीं दिया| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    वो वहाँ पर नहीं रहा!

    वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में ‘मुनीर’,जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    हाल की हो किस तरह ख़बर!

    रहबर को उनके हाल की हो किस तरह ख़बर,लोगों के दरमियां कभी आकर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    किसी के बराबर नहीं रहा!

    मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उनसे था,मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    रहना था उसको साथ मेरे!

    वो हुस्न-ए-नौबहार अबद शौक़ जिस्म सुन,रहना था उसको साथ मेरे, पर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी

  • 29th May 2022

    अब मेरे सर पर नहीं रहा!

    इस घर में जो कशिश थी, गई उन दिनों के साथ,इस घर का साया अब मेरे सर पर नहीं रहा| मुनीर नियाज़ी

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