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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Nov 2022

    गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी!

    सबसे नज़र बचा के वो मुझको कुछ ऐसे देखता, एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी| परवीन शाकिर

  • 25th Nov 2022

    उस पे तिरा जमाल भी!

    बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की, चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी| परवीन शाकिर

  • 25th Nov 2022

    कुछ था तिरा ख़याल भी!

    कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी, दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी| परवीन शाकिर

  • 25th Nov 2022

    निर्बीज क्यों हो चले हम!

    आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– इस तरह निर्बीज -सेक्यों हो चले हम आजहरियल घास…

  • 24th Nov 2022

    सुब्ह की तन्हाई-ए-सफ़र सोचो!

    ‘वसीम’ सुब्ह की तन्हाई-ए-सफ़र सोचो, मुशाएरा तो चलो रात भर का हो जाए| वसीम बरेलवी

  • 24th Nov 2022

    किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए!

    खुली हवाओं में उड़ना तो उसकी फ़ितरत है, परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए| वसीम बरेलवी

  • 24th Nov 2022

    और उधर का हो जाए!

    उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में, इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए| वसीम बरेलवी

  • 24th Nov 2022

    जो किसी रहगुज़र का हो जाए!

    हमारा अज़्म-ए-सफ़र कब किधर का हो जाए, ये वो नहीं जो किसी रहगुज़र का हो जाए| वसीम बरेलवी

  • 24th Nov 2022

    उन्हीं की रौशनी जिनके चराग़!

    उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी जिनके चराग़, मैं भी कुछ होता तो मेरा भी दिया होता कहीं| वसीम बरेलवी

  • 24th Nov 2022

    अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों!

    अपनों को अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों, और जब ऐसा किया मैं ने तो शरमाया नहीं| वसीम बरेलवी

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