-
अब शायरी है और मैं हूं!
जहां न सुख का हो अहसास और न दुख की कसक,उसी मक़ाम पे अब शायरी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
अजब तिश्नगी है और मैं हूं!
किसी मक़ाम पे रुकने को जी नहीं करता,अजीब प्यास, अजब तिश्नगी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
आलमे-दीवानगी है और मैं हूं!
अकेला इश्क़ है हिज्रो-विसाल* कुछ भी नहीं,बस एक आलमे-दीवानगी है और मैं हूं|(*विरह और मिलन) कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
बाज़ी बिछी है और मैं हूं!
मुक़ाबिल अपने कोई है ज़ुरूर कौन है वो,बिसाते-दहर है, बाज़ी बिछी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
कोई रौशनी है और मैं हूं!
मेरे वुजूद को अपने में जज़्ब करती हुई,नई-नई सी कोई रौशनी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
बीती हुई ज़िन्दगी है और मैं हूं!
हयात जैसे ठहर सी गयी हो ये ही नहीं,तमाम बीती हुई ज़िन्दगी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
अब वापसी है और मैं हूं!
ये लम्हा ज़ीस्त का बस आख़िरी है और मैं हूं,हर एक सम्त से अब वापसी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
हमेशा की तरह!
एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ गीत कवि और बहुत अच्छे इंसान, मेरे लिए बड़े भाई की तरह रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी के कुछ गीत तो ऐसे हैं कि उनको सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं और हम बहुत कुछ सोचने को…
-
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त!
फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो,फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो| इब्ने इंशा
-
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा!
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी प्रीत हमारी हो,फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो| इब्ने इंशा