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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Dec 2022

    मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो!

    हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो, राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 1st Dec 2022

    ख़ुद अपनी दवा होते हैं!

    हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले, दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 1st Dec 2022

    कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं!

    यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं, मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 1st Dec 2022

    पहले दिन का सूरज- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 1st Dec 2022

    बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं!

    नर्म अल्फ़ाज़ भली बातें मोहज़्ज़ब लहजे, पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं| जावेद अख़्तर

  • 30th Nov 2022

    दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं!

    छत की कड़ियों से उतरते हैं मिरे ख़्वाब मगर, मेरी दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं| जावेद अख़्तर

  • 30th Nov 2022

    कहें क्या कि किधर जाते हैं!

    रास्ता रोके खड़ी है यही उलझन कब से, कोई पूछे तो कहें क्या कि किधर जाते हैं| जावेद अख़्तर

  • 30th Nov 2022

    फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं!

    दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं, ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं| जावेद अख़्तर

  • 30th Nov 2022

    न पूरे शहर पर छाए तो कहना!

    धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है, न पूरे शहर पर छाए तो कहना| जावेद अख़्तर

  • 30th Nov 2022

    दिल ग़म से घबराए तो कहना!

    बदल जाओगे तुम ग़म सुन के मेरे, कभी दिल ग़म से घबराए तो कहना| जावेद अख़्तर

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