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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Jun 2022

    कोई आदमी न मिला!

    घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे, बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में!

    लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    फिर मुलाक़ात होगी!

    मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    ज़रा फ़ासले से मिला करो!

    कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    दिखावे की दोस्ती न मिला!

    मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला, अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता!

    कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    लेकिन ये गुंजाइश रहे!

    दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    क़ब्र से कम दी है ज़मीं!

    ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    उजाले अपनी यादों के…

    उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए| बशीर बद्र

  • 3rd Jun 2022

    वह हवा पहाड़ी!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी तरह के अनूठे गीतकार आदरणीय बुदधिनाथ मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और यह भी दोहराना मुझे अच्छा लगता है कि मैं और डॉक्टर मिश्र जी ने किसी समय एक ही संस्थान हिंदुस्तान…

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