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बे-चराग़ ये घर न हो!
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी,न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर न हो। बशीर बद्र
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न उठे सितारों की पालकी!
मिरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो। बशीर बद्र
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मिरी दुआ में असर न हो!
वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे, तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मिरी दुआ में असर न हो। बशीर बद्र
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मुझे एक रात नवाज़ दे!
कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो,मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बा’द सहर न हो। बशीर बद्र
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जान तुझ पर निसार करता हूँ!
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत हैं, मेरे स्वर में मिर्ज़ा ग़ालिब जी की ग़ज़ल के कुछ और शेर- जान तुझ पर निसार करता हूँ, मैं नहीं जानता दुआ क्या है! आशा है आपको यह पसंद आएंगे,धन्यवाद। ******
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कोई दुश्मन न कोई दोस्त!
जंगल में दूर तक कोई दुश्मन न कोई दोस्त,मानूस हो चले हैं मगर बम्बई से हम| निदा फ़ाज़ली
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पल पल दिल के पास!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं फिल्म-ब्लैकमेल के लिए किशोर कुमार जी का गाया यह गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे राजेंद्र कृष्ण जी ने लिखा था और कल्याणजी आनंदजी ने इसका संगीत तैयार किया था- पल पल दिल के पास तुम रहती हो! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। ******
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किसी दिन!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेष डबराल जी की यह कविता – किसी दिन हम दीवाल पर पीठ टिका देंगेहम जो बैठे हैंरोशनी में कविता बाँचते हुए किसी दिन हमारे…
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अच्छी भली थी दुनिया!
अच्छी भली थी दुनिया गुज़ारे के वास्ते,उलझे हुए हैं अपनी ही ख़ुद-आगही से हम| निदा फ़ाज़ली
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शाइस्ता महफ़िलों की !
शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था,ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम| निदा फ़ाज़ली