मुझे एक रात नवाज़ दे!

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो,
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बा’द सहर न हो।

बशीर बद्र

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