बे-चराग़ ये घर न हो!

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी,
न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर न हो।

बशीर बद्र

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