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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Jul 2022

    जैसे कोई गिलास – हम टूटे!

    एक हल्की सी ठेस लगते ही,जैसे कोई गिलास – हम टूटे| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    अच्छा हुआ भरम टूटे!

    रंज इसका नहीं कि हम टूटे,ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    आबो-हवा गोकुली हुई!

    मुरली सा कोई शख्स बजा जब भी ध्यान में,मेरे बदन की आबो-हवा गोकुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    देखती रही खिड़की खुली हुई!

    लट्टू की तरह घूम के चौराहा सो गया,चुपचाप देखती रही खिड़की खुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    धूप को बरगद कोई मिला!

    दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    शहर की भाषा धुली हुई!

    कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया!

    अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    उदास करने की ज़िद पर तुली हुई!

    मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई,क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई| सूर्यभानु गुप्त

  • 7th Jul 2022

    बिके अभावों के हाथों !

    आज फिर से मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे मधुर गीतकार और अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी के गीत मैं उस समय से गुनगुनाता रहा हूँ जब मेरी कविता में रुचि विकसित हुई थी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का…

  • 6th Jul 2022

    मेरे घर का रुख़ भी कर लेती!

    कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती, इधर पहुँची, उधर पहुँची, यहाँ आई, वहाँ आई| मुनव्वर राना

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