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ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा!
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा, मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा| परवीन शाकिर
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अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की!
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है, जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की| परवीन शाकिर
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जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा!
उसने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा, रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की| परवीन शाकिर
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क़यामत शब-ए-तन्हाई की!
तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे, तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की| परवीन शाकिर
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यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की!
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया, बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की| परवीन शाकिर
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मगर बात है रुस्वाई की!
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने, बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की| परवीन शाकिर
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फिसल गईं स्वीकृतियाँ!
एक बार फिर से मैं आज, मेरे लिए गुरू तुल्य रहे और बड़े भाई की तरह प्रेम करने वाले स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –…
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जब दुख का सूरज सर पर हो!
वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं, अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो| इब्न ए इंशा
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जब दिन और रात बराबर हो!
अब ‘इंशा’-जी को बुलाना क्या अब प्यार के दीप जलाना क्या, जब धूप और छाया एक से हों जब दिन और रात बराबर हो| इब्न ए इंशा