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अमृत पी के अमर हो जाएँगे!
ज़मज़म और गंगा-जल पी कर कौन बचा है मरने से, हम तो आँसू का ये अमृत पी के अमर हो जाएँगे| राही मासूम रज़ा
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कब लोग रिहाई पाएँगे!
परछाईं के इस जंगल में क्या कोई मौजूद नहीं, इस दश्त-ए-तन्हाई से कब लोग रिहाई पाएँगे| राही मासूम रज़ा
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ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए!
अहल-ए-दिल सहरा में गुम होते रहे, ज़िंदगी बैठी रही पर्दा किए| राही मासूम रज़ा
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ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़!
हम भी अमृत के तलबगार रहे हैं लेकिन, हाथ बढ़ जाते हैं ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़| राही मासूम रज़ा
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ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी!
सीने में ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी,गो ज़िन्दगी की कोई ज़रूरत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग!
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग,रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही| दुष्यंत कुमार