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ऋतुराज इक पल का!
आज एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि, वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत भी कुछ अलग किस्म का है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – राजमिस्त्री से…
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इश्क़ को आज़मा के देख लिया!
‘फ़ैज़’ तकमील-ए-ग़म भी हो न सकी, इश्क़ को आज़मा के देख लिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहुत कुछ जला के देख लिया!
राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया, दिल बहुत कुछ जला के देख लिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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महरम अगर नहीं कोई!
दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई, तो ‘फ़ैज़’ ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बे-वुज़ू ही सही!
न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में, नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आरज़ू ही सही!
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही, नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दो मेघ मिले बोले-डोले!
किसी समय काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले एक प्रमुख कवि रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| आशा है प्रेम की महानता को रेखांकित करने वाली यह कविता आपको पसंद आएगी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – दो मेघ मिले…