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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Jan 2023

    स्त्री!

    आज हिन्दी के एक वरिष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने स्त्री को लेकर कुछ अलग प्रकार की अभिव्यक्ति की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – एक हँसी का नाम है स्त्रीस्त्री एक रुलाई का नाम…

  • 17th Jan 2023

    तिरी याद आँखें दुखाने लगी!

    ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में, तिरी याद आँखें दुखाने लगी| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी!

    ख़यालों के तारीक खंडरात में, ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    तस्वीर बातें बनाने लगी!

    जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर, वो तस्वीर बातें बनाने लगी| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    उदासी की मेहनत ठिकाने लगी!

    कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया, उदासी की मेहनत ठिकाने लगी| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी!

    बदन पर नई फ़स्ल आने लगी, हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    बिखर रहे हैं पुरानी किताब के!

    किस तरह जम्अ’ कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब के!

    बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें, दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब* के|*मृगतृष्णा आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    आँख में जाले थे ख़्वाब के!

    सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के| आदिल मंसूरी

  • 17th Jan 2023

    नक़्श उठ आए गुलाब के!

    फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया, उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के| आदिल मंसूरी

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