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मेरी रात कैसे चमक गई!
कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई, मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई| बशीर बद्र
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उधार!
हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी ने तारसप्तक और तीन सप्तकों में प्रतिनिधि कवियों को संकलित करके नई कविता को भी मजबूत आधार प्रदान किया था| लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता…