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आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा!
ज़ंजीर ओ दीवार ही देखी तुम ने तो ‘मजरूह’ मगर हम, कूचा कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा!
जाओ तुम अपने बाम की ख़ातिर सारी लवें शम्ओं की कतर लो, ज़ख़्म के मेहर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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जान का नुक़साँ तुम से ज़ियादा!
हम भी हमेशा क़त्ल हुए और तुमने भी देखा दूर से लेकिन, ये न समझना हमको हुआ है जान का नुक़साँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा!
अहद-ए-वफ़ा यारों से निभाएँ नाज़-ए-हरीफ़ाँ हँस के उठाएँ, जब हमें अरमाँ तुमसे सिवा था अब हैं पशेमाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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हमको जुनूँ क्या सिखलाते हो!
हमको जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से ज़ियादा, चाक किए हैं हमने अज़ीज़ो चार गरेबाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
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ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं!
ऐसे हंस हंस के न देखा करो सबकी जानिब, लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी
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यूँ तो मिला करती हैं सबसे आँखें!
मिलने को यूँ तो मिला करती हैं सबसे आँखें, दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी
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निगाहों से अदा होते हैं!
हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो, राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी
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ख़ुद अपनी दवा होते हैं!
हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले, दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी
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कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं!
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं, मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं| मजरूह सुल्तानपुरी