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मुझे तलाश है सुनहरे हिरण की !
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता!
मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है, कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता| बशीर बद्र
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हज़ारों शेर मेरे सो गए!
हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में, अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता| बशीर बद्र
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पंटर चला गया!
बीता दिन पंटर का आखिरी दिन था| पिछले 15 वर्ष हमारे साथ बिताने के बाद हमारा प्रिय पंटर आखिर चला गया| एक महीने का था जब हमारे पास आया था, जब हम एनटीपीसी की ऊंचाहार परियोजना में थे| दिल्ली में बेटे ने अपने एक मित्र से उसको लिया था और वहाँ से अपनी पहली रेल…
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मिलने में हमेशा फ़ासला रखना!
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना, जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता| बशीर बद्र
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तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है !
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं, तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई| बशीर बद्र
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शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई!
तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है, मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई| बशीर बद्र
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न कभी तुम्हारी झिझक गई!
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले, न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई| बशीर बद्र
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तिरी आँख कैसे झपक गई!
मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में, मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई| बशीर बद्र