आज फिर से मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे मधुर गीतकार और अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी के गीत मैं उस समय से गुनगुनाता रहा हूँ जब मेरी कविता में रुचि विकसित हुई थी|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का यह नवगीत –

मन बेचारा एकवचन
लेकिन
दर्द हजार गुने ।
चाँदी की चम्मच लेकर
जन्में नहीं हमारे दिन
अँधियारी रातों के घर
रह आए भावुक पल-छिन
चंदा से सौ बातें कीं
सूरज ने जब घातें कीं
किंतु एक नक्कारगेह में
तूती की ध्वनि
कौन सुने ।
बिके अभावों के हाथों
सपने खील-बताशों के
भरे नुकीले शूलों से
आँगन-
खेल तमाशों के
कुछ को चूहे काट गए
कुछ को झींगुर चाट गए
नए-नए संकल्पों के
जो भी हमने जाल बुने।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a Reply