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अच्छा सा मकीं ढूँढना था!
पहले तामीर हमें करना था अच्छा सा मकाँ, फिर मकाँ के लिए अच्छा सा मकीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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जंगल में यक़ीं ढूँढना था!
जो कहीं था ही नहीं उसको कहीं ढूँढना था, हमको इक वहम के जंगल में यक़ीं ढूँढना था| राजेश रेड्डी
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जीवन लय!
आज मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी ने नवगीत आंदोलन का कुशल नेतृत्व किया तथा नवगीत संबंधी की संकलनों का संपादन भी किया था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह नवगीत – शब्द है,स्वर है,सजग अनुभूति…
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हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में!
नंगी सड़कों पर भटक कर देख जब मरती है रात, रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी
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पथराव से घबराना तेरे शहर में!
जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना, कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी
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देखा गया दीवाना तेरे शहर में!
आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ, आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में| कैफ़ी आज़मी
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अब ऐसी तसल्ली रहने दो!
क्या दर्द किसी का लेगा कोई इतना तो किसी में दर्द नहीं, बहते हुए आँसू और बहें अब ऐसी तसल्ली रहने दो| कैफ़ी आज़मी
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जो तुमने दिया वो सहने दो!
इक ख़्वाब ख़ुशी का देखा नहीं देखा जो कभी तो भूल गए, माँगा हुआ तुम कुछ दे न सके जो तुमने दिया वो सहने दो| कैफ़ी आज़मी
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अब बहते हैं आँसू बहने दो!
ये फूल चमन में कैसा खिला माली की नज़र में प्यार नहीं, हँसते हुए क्या क्या देख लिया अब बहते हैं आँसू बहने दो| कैफ़ी आज़मी