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दीवार-ए-तन्हाई भी होती है!
हम उनकी बज़्म तक जा ही पहुँचते हैं किसी सूरत, अगरचे राह में दीवार-ए-तन्हाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई
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दीवानों की रुस्वाई भी होती है!
गरेबाँ दर गरेबाँ नुक्ता-आराई भी होती है, बहार आए तो दीवानों की रुस्वाई भी होती है| क़तील शिफ़ाई
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गुलफ़ाम से जल जाते हैं!
बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम, शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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गुमनाम से जल जाते हैं!
शम्अ’ जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए, हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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शाम से जल जाते हैं!
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं, हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं| क़तील शिफ़ाई
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रोटी का सवाल!
हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक प्रभावशाली कविता आज प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें भूखे लोगों के बीच एक रोटी का महत्व बताया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – कितनी रोटीगाँव में अकाल था,बुरा हाल था।एक बुढ़ऊ नेसमय बिताने को,यों ही पूछामन बहलाने…
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दर्द का रस्ता छोड़ दिया है!
एक ‘फ़राज़’ तुम्हीं तन्हा हो जो अब तक दुख के रसिया हो, वर्ना अक्सर दिल वालों ने दर्द का रस्ता छोड़ दिया है| अहमद फ़राज़
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मैं भी जिया हूँ वो भी जिया है!
हिज्र की रुत जाँ-लेवा थी पर ग़लत सभी अंदाज़े निकले, ताज़ा रिफ़ाक़त* के मौसम तक मैं भी जिया हूँ वो भी जिया है|* Companionship अहमद फ़राज़
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उसको क्यूँ बे-ख़्वाब किया है!
अपना ये शेवा तो नहीं था अपने ग़म औरों को सौंपें, ख़ुद तो जागते या सोते हैं उसको क्यूँ बे-ख़्वाब किया है| अहमद फ़राज़
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और आँखों को मूँद लिया है!
अब क्या सोचें क्या हालात थे किस कारन ये ज़हर पिया है, हमने उसके शहर को छोड़ा और आँखों को मूँद लिया है| अहमद फ़राज़