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मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे!
मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे, सीपियाँ हैं तो फिर गुहर* रख दे|*मोती शीन काफ़ निज़ाम
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उसने बुझा दिया होगा!
गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है ‘निज़ाम’, चराग़ याद का उसने बुझा दिया होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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कोई तुझे पीछे से देखता होगा!
चुभन ये पीठ में कैसी है मुड़ के देख तो ले, कहीं कोई तुझे पीछे से देखता होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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नाम भी इस में कहीं लिखा होगा!
पुराने वक़्तों का है क़स्र* ज़िंदगी मेरी, तुम्हारा नाम भी इस में कहीं लिखा होगा|*महल, History शीन काफ़ निज़ाम
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कहीं चाक ढूँढता होगा!
किवाड़ों पर लिखी अबजद गवाही देती है, वो हफ़्त-रंगी कहीं चाक ढूँढता होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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मुझे उसने क्या लिखा होगा!
वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा, मैं जानता हूँ मुझे उसने क्या लिखा होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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वक़्त की मीनार पर!
आज एक बार फिर से मैं नवगीत आंदोलन के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शंभुनाथ जी ने अपने गीतों और नेतृत्व- संकलन, संपादन आदि के माध्यम से नवगीत को सुदृढ़ आधार प्रदान किया था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – मैं…
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दीवार से लग जाते हैं!
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं, दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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शाइर मगर अच्छा लगा!
‘मीर’ के मानिंद अक्सर ज़ीस्त करता था ‘फ़राज़’, था तो वो दीवाना सा शाइर मगर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़
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अपनी अपनी चाहतें हैं!
अपनी अपनी चाहतें हैं लोग अब जो भी कहें, इक परी-पैकर* को इक आशुफ़्ता-सर** अच्छा लगा|*सुंदरी, **सिरफिरा अहमद फ़राज़