-
सुब्ह किधर निकल गई!
आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र ‘फ़ैज़’ न जाने क्या हुए, रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
बात बदल बदल गई!
दिल से तो हर मोआ’मला करके चले थे साफ़ हम, कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
रात मचल मचल गई!
जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी, जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
हिज्र की रात ढल गई!
बज़्म-ए-ख़याल में तिरे हुस्न की शम्अ जल गई, दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
दिल था कि फिर बहल गया!
शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई, दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
जिंदगी अपनी नहीं!
लीजिए आज एक बार फिर से मैं, मेरे लिए बड़े भाई और गुरू जैसा दर्जा रखने वाले, पारंपरिक गीत और नवगीत दोनों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर बेचैन जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
-
ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया!
शहर को बरबाद करके रख दिया उसने ‘मुनीर’, शहर पर ये ज़ुल्म मेरे नाम पर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
-
शहर में ना-मो’तबर उसने किया!
शहर में वो मो’तबर मेरी गवाही से हुआ, फिर मुझे इस शहर में ना-मो’तबर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
-
राहबर बना गुमराह करने के लिए!
राहबर मेरा बना गुमराह करने के लिए, मुझको सीधे रास्ते से दर-ब-दर उसने किया| मुनीर नियाज़ी
-
मगर उसको बसर उसने किया!
मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर उसने किया, उम्र मेरी थी मगर उसको बसर उसने किया| मुनीर नियाज़ी