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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Feb 2023

    कभी आँखों में आँसू आ गया है!

    कभी ख़ुश कर गई मुझको तिरी याद, कभी आँखों में आँसू आ गया है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Feb 2023

    मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है!

    तिरा ग़म क्या है बस ये जानता हूँ, कि मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Feb 2023

    शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है!

    समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है, शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 5th Feb 2023

    उस दिन!

    काफी लंबे समय के बाद मैं एक बार फिर से अपने प्रिय फिल्मी गीतकार स्वर्गीय शैलेंद्र जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| लेकिन यह फिल्मी गीत नहीं है| शैलेंद्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी का यह प्रेम गीत – उस दिन…

  • 4th Feb 2023

    चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया!

    अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स, गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया| निदा फ़ाज़ली

  • 4th Feb 2023

    बहुत सोचता था वो!

    उसका क़ुसूर ये था बहुत सोचता था वो, वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया| निदा फ़ाज़ली

  • 4th Feb 2023

    मस्जिदों से नमाज़ी चले गए!

    उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए, दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया| निदा फ़ाज़ली

  • 4th Feb 2023

    अंजाम रह गया!

    छोटी थी उम्र और फ़साना तवील था, आग़ाज़ ही लिखा गया अंजाम रह गया| निदा फ़ाज़ली

  • 4th Feb 2023

    हमेशा कोई काम रह गया!

    कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया, हर काम में हमेशा कोई काम रह गया| निदा फ़ाज़ली

  • 4th Feb 2023

    हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा!

    आइना देख के निकला था मैं घर से बाहर, आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा| निदा फ़ाज़ली

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