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याद के साये हैं पनाहों की तरह!
हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त,बस तेरी याद के साये हैं पनाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह!
अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यों कर,दिल ही दुश्मन हैं मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर
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ऋतुओं की संधि!
आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गीतकार और कुशल मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत, जिसमें ऋतुओं के संधि काल का विशेष वर्णन किया गया…
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ज़माने में यही होता रहा है!
मोहब्बत में ‘फ़िराक़’ इतना न ग़म कर, ज़माने में यही होता रहा है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर!
जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर, मोहब्बत इक मुसलसल माजरा है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तेरा दर्द अब तक जागता है!
जिसे चौंका के तूने फेर ली आँख, वो तेरा दर्द अब तक जागता है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है!
न जी ख़ुश कर सका तेरा करम भी, मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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निगाहों को बड़ा धोका हुआ है!
हिजाबों को समझ बैठा मैं जल्वा, निगाहों को बड़ा धोका हुआ है| फ़िराक़ गोरखपुरी