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जागता रहता है हर नींद में–
मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे, जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा| निदा फ़ाज़ली
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आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा!
एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे, मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा| निदा फ़ाज़ली
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ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा!
किससे पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से, हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा| निदा फ़ाज़ली
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मुझी में है समुंदर मेरा!
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा, मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा| निदा फ़ाज़ली
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बादल आये रे!
आज एक बार फिर से मैं, साहित्य के सभी क्षेत्रों में अपने कृतित्व की छाप छोड़ने वाले श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल – पानी बरसा…
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कब हश्र मुअ’य्यन है !
कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना, कब हश्र मुअ’य्यन है तुझको तो ख़बर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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यारों की किस तरह बसर होगी!
वाइ’ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है, अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कब जान लहू होगी!
कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा, किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सुनते थे सहर होगी!
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी, सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़