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क्या गाऊँ!
आज फिर हिन्दी कविता के विराट पुरुष- महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| निराला जी ने इस कविता में भी माता सरस्वती के समक्ष अपना विनम्र निवेदन किया है| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी…
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रात सपना बहार का देखा!
रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा,बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
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इस जवानी को नाम क्या दें हम!
आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा,भूल ही भूल जिसकी आदत है इस जवानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
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मेहरबानी को नाम क्या दें हम!
आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर,आपकी ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
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कहानी को नाम क्या दें हम!
ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दें हम,प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
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सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम!
लबों से लब जो मिल गए, लबों से लब जो सिल गए,सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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लिखा था जिस किताब में!
लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है,हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई!
मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गई,गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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चराग़-ओ-आफ़्ताब ग़ुम!
चराग़-ओ-आफ़्ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी,शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फ़ाकिर
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इंसाफ़ के शाहों की तरह!
जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाये, “फ़ाकिर”,वो भी पेश आये हैं इंसाफ़ के शाहों की तरह| सुदर्शन फ़ाकिर