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मिलन!
एक बार फिर से मैं आज छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी ने अपनी रचनाओं में पीड़ा की बड़ी प्रभावी अभिव्यक्ति दी है| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है महादेवी वर्मा जी की…
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हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाब!
उसने बोए दिल-ए-हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाबरेगज़ार उसके लहू से चमन आसा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था!
अपने ज़ख्मो का हमें बक्श रहा था वो सवाबउसकी हर आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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सहराओ में घनघोर घटा सा भी था!
गम के सहराओ में घनघोर घटा सा भी था,वो दिलावर जो कई रोज़ का प्यासा भी था॥ क़तील शिफ़ाई
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दिल धड़का हम समझे वो आए है!
रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है,अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है॥ क़तील शिफ़ाई
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दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं!
तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं,एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं॥ क़तील शिफ़ाई
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अपने बदन से तेरी खुशबू आए!
जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए,देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए॥ क़तील शिफ़ाई
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हसीन शख्स की बातों में आ गया!
सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया,मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया॥ क़तील शिफ़ाई
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ये जादू नज़र आए मुझको!
सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको,जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको॥ क़तील शिफ़ाई
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सब जीवन बीता जाता है!
आज फिर से मैं माँ भारती के अनूठे गौरव गायक और छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता– सब जीवन बीता जाता हैधूप छाँह…