-
कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा!
हम भी क़ाएल हैं वफ़ा में उस्तुवारी* के मगर, कोई पूछे कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा|*Strength अहमद फ़राज़
-
कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा!
बाग़बाँ गुलचीं को चाहे जो कहे हमको तो फूल, शाख़ से बढ़ कर कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़
-
मुझको अपना घर अच्छा लगा!
हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद, आज वो आया तो मुझको अपना घर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़
-
दिल का मसअला है पर हमें!
दिल का दुख जाना तो दिल का मसअला है पर हमें, उसका हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़
-
कोई हम-सफ़र अच्छा लगा!
गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा, मुद्दतों के बाद कोई हम-सफ़र अच्छा लगा| अहमद फ़राज़
-
आम के हैं पेड़ बाबा!
आज मैं श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ग्रामीण परिवेश को लेकर अनूप जी ने बहुत अच्छे गीत लिखे हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह गीत – आम के हैं पेड़ बाबापिता फलनाती टिकोरे हैं । भात में है दूधरोटी में रहे घी,पोपले मुँह कीअसीसेंहम…
-
पलकें बोझल रहती थीं!
एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं, एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं| जावेद अख़्तर
-
चाँद पे परियाँ रहती थीं!
मुझको यकीं है सच कहती थी, जो भी अम्मी कहती थी, जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद पे परियाँ रहती थीं| जावेद अख़्तर