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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 31st Jan 2023

    कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा!

    हम भी क़ाएल हैं वफ़ा में उस्तुवारी* के मगर, कोई पूछे कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा|*Strength अहमद फ़राज़

  • 31st Jan 2023

    कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा!

    बाग़बाँ गुलचीं को चाहे जो कहे हमको तो फूल, शाख़ से बढ़ कर कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़

  • 31st Jan 2023

    मुझको अपना घर अच्छा लगा!

    हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद, आज वो आया तो मुझको अपना घर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़

  • 31st Jan 2023

    दिल का मसअला है पर हमें!

    दिल का दुख जाना तो दिल का मसअला है पर हमें, उसका हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा| अहमद फ़राज़

  • 31st Jan 2023

    कोई हम-सफ़र अच्छा लगा!

    गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा, मुद्दतों के बाद कोई हम-सफ़र अच्छा लगा| अहमद फ़राज़

  • 31st Jan 2023

    आम के हैं पेड़ बाबा!

    आज मैं श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ग्रामीण परिवेश को लेकर अनूप जी ने बहुत अच्छे गीत लिखे हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह गीत – आम के हैं पेड़ बाबापिता फलनाती टिकोरे हैं । भात में है दूधरोटी में रहे घी,पोपले मुँह कीअसीसेंहम…

  • 30th Jan 2023

    ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं!

    एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का, एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं| जावेद अख़्तर

  • 30th Jan 2023

    पलकें बोझल रहती थीं!

    एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं, एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं| जावेद अख़्तर

  • 30th Jan 2023

    चाँद पे परियाँ रहती थीं!

    मुझको यकीं है सच कहती थी, जो भी अम्मी कहती थी, जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद पे परियाँ रहती थीं| जावेद अख़्तर

  • 30th Jan 2023

    आओ खेलें सारी गलियाँ कहती थीं!

    एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं, एक वो दिन जब आओ खेलें सारी गलियाँ कहती थीं| जावेद अख़्तर

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