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सड़क!
एक बार फिर से मैं आज श्री रामदरश मिश्र जी की एक लंबी रचना शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में सड़क कवि को ज़िंदगी के किन मुहानों पर ले जाती है, यह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – सड़क ने कहा-‘‘चलोगे ?’’‘‘कहाँ ?’’‘‘दायरे से…
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लिए दिल नहीं थोड़ा करते!
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा, जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते| गुलज़ार
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ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते!
जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें, इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते| गुलज़ार
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कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते!
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो, ऐसे दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते| गुलज़ार
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टुकड़े नहीं जोड़ा करते!
जिसकी आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन, ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते| गुलज़ार