-
लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता!
उस बंदा-ए-ख़ुद्दार पे नबियों का है साया, जो भूक में भी लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
कोई कंकर नहीं गिरता!
हैराँ है कई रोज़ से ठहरा हुआ पानी, तालाब में अब क्यूँ कोई कंकर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
कोई फिसलकर नहीं गिरता!
इतना तो हुआ फ़ाएदा बारिश की कमी का, इस शहर में अब कोई फिसलकर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
जिसमें कोई पत्थर नहीं गिरता!
समझो वहाँ फलदार शजर कोई नहीं है, वो सहन कि जिसमें कोई पत्थर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
कितने दिन चलेगा!
हिन्दी काव्य मंचों पर ‘गीतों के राजकुंवर’ के नाम से विख्यात स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी लिखा है नीरज जी ने हिन्दी गीत साहित्य में और फिल्मी गीतों के माध्यम से अपना अमूल्य योगदान किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास…
-
दरिया में समुंदर नहीं गिरता!
गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया, लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता!
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता, टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता| क़तील शिफ़ाई
-
अपने पराए पहचाने कहाँ जाते!
‘क़तील’ अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता, तो फिर अपने पराए हमसे पहचाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई
-
ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते!
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी, वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते| क़तील शिफ़ाई