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किसी से मोहब्बत उसे भी थी!
ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी, मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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कई बार चराग़ों को बुझा कर!
इस शब के मुक़द्दर में सहर ही नहीं ‘मोहसिन’, देखा है कई बार चराग़ों को बुझा कर| मोहसिन नक़वी
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दुश्मन की भी पहचान कहाँ है!
ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है, तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात* रहा कर|*मोहित मोहसिन नक़वी
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कभी रो भी लिया कर!
हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे, तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर| मोहसिन नक़वी
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परिंदों को दरख़्तों से उड़ाकर!
क्या जानिए क्यूँ तेज़ हवा सोच में गुम है, ख़्वाबीदा परिंदों को दरख़्तों से उड़ाकर| मोहसिन नक़वी
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क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर!
उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर, हालात की क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर| मोहसिन नक़वी
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गीत-आघात!
फिर से आज मैं हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बहुत सहज तरीके से गहरी बात कह देते थे| उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता– तोड़ रहे…
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शहर में हैं वो सूरतें बाक़ी!
जिनके होने से हम भी हैं ऐ दिल, शहर में हैं वो सूरतें बाक़ी| मुनीर नियाज़ी