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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Feb 2023

    सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो!

    महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है, फिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

  • 23rd Feb 2023

    सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो!

    उनका ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है, सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

  • 23rd Feb 2023

    क्यूँ सुक़रात बनो ख़ामोश रहो!

    सच अच्छा पर उसके जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी, पागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

  • 23rd Feb 2023

    ऐ लोगो ख़ामोश रहो!

    कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो, ऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

  • 23rd Feb 2023

    धूप से नफ़रत उसे भी थी!

    तन्हा हुआ सफ़र में तो मुझ पे खुला ये भेद, साए से प्यार धूप से नफ़रत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी

  • 23rd Feb 2023

    सुनता था सबसे पुरानी कहानियाँ!

    सुनता था वो भी सब से पुरानी कहानियाँ, शायद रफ़ाक़तों की ज़रूरत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी

  • 23rd Feb 2023

    हर साँस क़यामत उसे भी थी!

    वो मुझसे बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया, वर्ना हर एक साँस क़यामत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी

  • 23rd Feb 2023

    कितना अच्छा होता है!

    आज फिर से मैं हिन्दी के विख्यात कवि तथा साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अपनी विशिष्ट शैली रही है और उन्होंने कुछ कालजयी रचनाएं की हैं| उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…

  • 22nd Feb 2023

    शहर-भर से अदावत उसे भी थी!

    मुझ से बिछड़ के शहर में घुल-मिल गया वो शख़्स, हालाँकि शहर-भर से अदावत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी

  • 22nd Feb 2023

    शौक़ था नए चेहरों की दीद का!

    मुझ को भी शौक़ था नए चेहरों की दीद का, रस्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी

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