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मुर्दा लोगों की आदतें बाक़ी!
ज़िंदा लोगों की बूद-ओ-बाश में हैं, मुर्दा लोगों की आदतें बाक़ी| मुनीर नियाज़ी
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और हैं कितनी मंज़िलें बाक़ी!
और हैं कितनी मंज़िलें बाक़ी, जान कितनी है जिस्म में बाक़ी| मुनीर नियाज़ी
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चाहता था पर ऐसा नहीं हुआ!
मिलना था एक बार उसे फिर कहीं ‘मुनीर’, ऐसा मैं चाहता था पर ऐसा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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यहाँ रहे हैं ये अपना नहीं हुआ!
मुश्किल हुआ है रहना हमें इस दयार में, बरसों यहाँ रहे हैं ये अपना नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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जिसमें कोई हम-सफ़र नहीं!
ऐसा सफ़र है जिसमें कोई हम-सफ़र नहीं, रस्ता है इस तरह का जो देखा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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चुप हुआ कि तमाशा नहीं हुआ!
रंज-ए-फ़िराक़-ए-यार में रुस्वा नहीं हुआ, इतना मैं चुप हुआ कि तमाशा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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मुस्कानों के नेपकिन बिछा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में भी त्यागी जी की पैनी व्यंग्य दृष्टि का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता– मुस्कानों के नेपकिन बिछावे एक-दूसरे को ही…
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तेरी ही अदा पेश करूँ!
जो तिरे दिल को लुभाए वो अदा मुझ में नहीं, क्यूँ न तुझ को कोई तेरी ही अदा पेश करूँ| साहिर लुधियानवी
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चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूँ!
मेरे ख़्वाबों में भी तू मेरे ख़यालों में भी तू, कौन सी चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूँ| साहिर लुधियानवी
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जुदाई का गिला पेश करूँ!
तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छेड़ूँ, या तिरे दर्द-ए-जुदाई का गिला पेश करूँ| साहिर लुधियानवी