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अपनी वफ़ा पेश करूँ!
अपना दिल पेश करूँ अपनी वफ़ा पेश करूँ, कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँ| साहिर लुधियानवी
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झिझकने की ज़रूरत क्या है!
इस क़दर हमसे झिझकने की ज़रूरत क्या है, ज़िंदगी भर का है अब साथ क़रीब आ जाओ| साहिर लुधियानवी
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भड़कते हैं बदन में शो’ले!
सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो’ले, जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ| साहिर लुधियानवी
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मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की!
एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की, आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ| साहिर लुधियानवी
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दूर रह कर न करो बात !
दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ, याद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ| साहिर लुधियानवी
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कितने दिन चलेगा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी गीत विधा के अमिट हस्ताक्षर, गीतों के राजकुंवर कहलाने वाले और कवि सम्मेलनों में श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देने वाले स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं तथा हिन्दी फिल्मों…
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सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा!
इस अदू-ए-जाँ को ‘अमजद’ मैं बुरा कैसे कहूँ, जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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घूमना अच्छा लगा!
नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल, तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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वो सनसनी प्यारी लगी!
बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी, कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा!
दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे, वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद