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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Mar 2023

    गुल-दान सजाऊँ किस के लिए!

    अब शहर में उसका बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं, ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी

  • 2nd Mar 2023

    मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए!

    वो शहर में था तो उसके लिए औरों से भी मिलना पड़ता था, अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी

  • 2nd Mar 2023

    अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए!

    जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई, इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी

  • 2nd Mar 2023

    मैं बाहर जाऊँ किसके लिए!

    नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किसके लिए, वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी

  • 2nd Mar 2023

    कब का तर्क इस्लाम किया!

    ‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो, क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया| मीर तक़ी मीर

  • 2nd Mar 2023

    रात को रो रो सुब्ह किया!

    याँ के सपीद ओ सियह में हम को दख़्ल जो है सो इतना है, रात को रो रो सुब्ह किया या दिन को जूँ तूँ शाम किया| मीर तक़ी मीर

  • 2nd Mar 2023

    दीदार को अपने आम किया!

    काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है, आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया| मीर तक़ी मीर

  • 2nd Mar 2023

    दूर से देखता हूँ– रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…

  • 24th Feb 2023

    पाँच दिन की छुट्टी!

    एक बार फिर से इंटरनेट से पाँच दिन के लिए दूर जा रहा हूँ|आज के बाद अगली पोस्ट या ऑनलाइन गतिविधि 2 मार्च को ही होगी|

  • 24th Feb 2023

    कुर्ता टोपी मस्ती में इनआ’म किया!

    शैख़ जो है मस्जिद में, नंगा रात को था मय-ख़ाने में, जुब्बा ख़िर्क़ा कुर्ता टोपी मस्ती में इनआ’म किया| मीर तक़ी मीर

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