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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Aug 2022

    वो जब चाहेगा बुला लेगा!

    हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उससे रिश्ता ‘वसीम’, मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    लकीरें हाथ की वो सब जला लेगा!

    मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे, लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा!

    मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा, कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    मिरा इम्तिहान क्या लेगा!

    मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा, अब इसके बा’द मिरा इम्तिहान क्या लेगा| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    तूफ़ान हिला भी नहीं सकता!

    वैसे तो इक आँसू ही बहाकर मुझे ले जाए, ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता!

    घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी, मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    बता भी नहीं सकता!

    प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात, किसके लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    साथ निभा भी नहीं सकता!

    तू छोड़ रहा है तो ख़ता इसमें तिरी क्या, हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    आँख तक आ भी नहीं सकता!

    क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता, आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 25th Aug 2022

    शाम के वक़्त कभी!

    आज फिर से मैं हिन्दी के एक अत्यंत चर्चित और सृजनशील रचनाकार श्री सूर्यभानु गुप्त जी एक रचना शेयर कर रहूँ| श्री सूर्यभानु गुप्त जी के बहुत से शेर मैं अक्सर उद्धृत करता हूँ जैसे- ‘दिलवाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं’ आदि|…

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