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आ जा रे परदेसी!!
आज मधुमती फिल्म के लिए शैलेन्द्र जी का लिखा एक फिल्मी गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने गाया था|| लीजिए आज प्रस्तुत हैं पुराने जमाने के इस सुपरहिट मधुर गीत के बोल- आ जा रे परदेसीमैं तो कब से खड़ी इस पारये…
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तिरे लब का बदल कहते हैं!
वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़, पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं| क़तील शिफ़ाई
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उसे ताज-महल कहते हैं!
उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन, देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं| क़तील शिफ़ाई
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सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं!
हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं, उनकी सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं| क़तील शिफ़ाई
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कश्तियों को डुबोया करेंगे हम!
गर दे गया दग़ा हमें तूफ़ान भी ‘क़तील’, साहिल पे कश्तियों को डुबोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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बीज न बोया करेंगे हम!
दिल जल रहा है ज़र्द शजर देख देख कर, अब चाहतों के बीज न बोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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जुर्म भी गोया करेंगे हम!
मजबूरियों के ज़हर से कर लेंगे ख़ुदकुशी, ये बुज़दिली का जुर्म भी गोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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चाँदनी में भिगोया करेंगे हम!
जब दूरियों की आग दिलों को जलाएगी, जिस्मों को चाँदनी में भिगोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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पलक में पिरोया करेंगे हम!
आँसू छलक छलक के सताएँगे रात भर, मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई
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याद में रोया करेंगे हम!
मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम, इक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम| क़तील शिफ़ाई